बुधवार, 28 नवंबर 2007

ओम शान्ति ओम

ओम शान्ति ओम यह फ़िल्म दिवाली के दिन रिलीज़ हुई थी। माना जात है कि कई सालों में यह सबसे बडी फ़िल्म है। भारत में अपने पहले ही हफ़्ते में उन्होंने 20 मिल्ल्यन डॉलर बना लिये। आज यह फ़िल्म यु-के के भी टॉप दस फ़िल्मों के लिस्ट में है जो काफ़ी गर्व की बात है।इस फ़िल्म के उत्पादक स्वयं शाहरुख खान ही है जो कि फ़िल्म के अभीनेता भी है। इस फ़िल्म के निर्देशक उनकी दोस्त फ़राह खान है और यह फ़िल्म उनकी दुसरी ही फ़िल्म है और उन्होंने कमाल का काम किय है। इस फ़िल्म में दिपिका पदुकोण पहली बार अभिनेत्री बनी है और उन्होंने बहुत अच्छी ऍक्टिन्ग की है।
इस फ़िल्म का पहला भाग 1970’स में लिया है जब ओम(शाहरुख खान) एक जुन्यर आर्टिस्ट थे और शान्ति(दिपिका) एक बडी अभिनेत्री थी और ओम उससे बहुत प्यार करता था। परन्तु उन दोनों की मौत हो गयी और फ़िर दोनों का पुनर्जन्म हुआ। इस बार ओम बहुत बडा अभिनय बन गया और जब वह तीस साल क हुआ तब उसे शान्ति वापस मिलती है। इस बार शान्ति एक जुन्यर आर्टिस्ट है। परन्तु यह मूवी जरूर देखनी चाहिए और इस फ़िल्म का एक गाना है जिसमें 31 स्टार्स है और बहुत ही हिट हुआ।
-ॠषित दवे

डॅन ब्राऊन

डॅन ब्राऊन मेरे प्रिय लेखकों में से एक है। उनकी आज तक चार किताबें बाहर पडी हैं और मुझे चारों बहुत पसन्द आयी। उनकी पुस्तकों की एक बात यह है कि वह बहुत ही सोच विचार के बाद लिख्ते है। उनका जन्म जून 22 1964 में हुआ था। 2003 की उनकी ‘द डा विन्ची कोड’ किताब विश्व प्रसिद्ध बनी और दो साल पहले उसपर एक मूवी भी बनायी गयी। परन्तु मेरे खयाल से यह मूवी किताब जितनी अच्छी नही थी।
उनका जन्म एक्सेटेर, न्यू हॅम्प्शायर में हुआ था और उनके पिता वहा के प्रसिद्ध विद्यालय में गणित सिखाते थे।उनकी माँ एक म्युसिशन थी। वह ऍम्हर्स्ट महाविद्यालय में दाखिल हुए। उनकी शादी 1997 में ब्लाय्थ न्यूलन के साथ हुई जो कि उनसे 12 साल बडी थी और उन्हे ऊपर लाने की कोशिश कर रही थी। वह ब्राऊन को एक गायक बनाने में मदत कर रही थी। 1993 में ब्राऊन ने अपनी पहली म्युझिक सीडी बाहर निकाली। इसके बाद वह अपने जन्म गाव लौट आये और उन्ही कि विद्यालय फ़िलिप्स एक्सेटेर में वे अन्ग्रेजी और स्पॅनिश सिखाने लगे।
1996 में वे शिक्षक के पद से उतर गये और अपना सारा समय किताबें लिखने में डाल दिया। 1998 में उनकी पहली किताब डिजिटल फ़ोर्ट्रेस बाहर आयी।इसके बाद उन्की अगले 6 सालों में ऍन्जल्स ऍन्ड डीमन्स, दिसेप्शन पोईन्ट और दा विन्ची कोड बाहर आयी और यह सारि किताबें न्यु यॉर्क टाईम्स बेस्ट सेलर्स के लिस्ट में शामिल हुई।
-ॠषित दवे

मंगलवार, 27 नवंबर 2007

भारत के महान ग्रंथ, भाग 2: महाभारत

महाभारत भारत का एक ऐतिहासिक ग्रंथ है। महाभारत की पावन कथा महर्षि वेद व्यास ने लिखी थी। जीवन में विरोध भाव, द्वेष, क्रोध और ईर्ष्या से सफलता कभी प्राप्त नहीं हो सकती। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण महाभारत है।

सम्राट भरत, राजा दुष्यंत और ऋषि-कन्या शकुन्तला के पुत्र थे। भरत बड़े पराक्रमी, वीर, उदार और विद्वान थे उनके नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। उन्हें अपने पुत्रों में से कोई ऐसा योग्य पुत्र दिखाई नहीं दिया, जिसे अपना उत्तराधिकारी बना सकें। अतः उन्होने ऋषि भरद्वाज के ज्येष्ठ पुत्र को अपने बाद राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया, और इसी के साथ भारत में प्रजातंत्र का प्रारंभ हुआ।

कई वंशज बीतने के पश्चात भरत के वंश के ही राजा शांतनु हुए जो बहुत गुणवान, वीर और प्रजापालाक थे उनके पुत्र देवरथ थे। उन्होंने अपने पिता की इच्छा पूर्ति के लिए अविवाहित रहने की भीषण प्रतिज्ञा की। इस कारण उनका नाम भीष्म पड़ गया। आगे चलकर वे भीष्म पितामह के नाम से भी जाने गये। महाराज शांतानु और सत्यवति से दो पुत्र चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए चित्रांगद बहुत जल्दी युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हो गये। विचित्रवीर्य की दो रानियाँ थीं। अंबिका और अंबालिका। कुछ समय पश्चयात विचित्रवीर्य निहसांतान ही मृत्यु को प्राप्त हो गये।

रानी सात्यवती के बुलाने पर महर्षि वेद व्यास आए। वे बहुत ही कुरुप थे। वेद व्यास अपने योग-बल से कुछ भी कर सकते थे। इसलिए जब अंबिका के कक्ष में वे गये, तो उनका कुरुप चेहरा देखकर उनकी आखें बंद हो गयी। इस कारण उनका पुत्र धृतराष्ट्र, नेत्रहीन पैदा हुआ। उसके बाद वेद व्यास अंबालिका के कक्ष में गये, तो अंबालिका का चेहरा भय से पीला पड़ गया। उनके पुत्र बीमार रहते थे और उनका नाम पांड़ू पड़ गया। तीसरा पुत्र दासी से हुआ जो बहुत ही बुद्धिमान और विवेकी था, उसका नाम विदुर रखा गया। धृतराष्ट्र से सौ पुत्र और एक कन्या का जन्म हुई और पांड़ू से पाँच पुत्र हुए। धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहला और पांड़ू के पाँचो पुत्र पांडव कहलाए।

पांडवों का सत्य पर विश्वास था। कौरवों अहंकारी और दुराचारी थे। वे छल कपट में विश्वास करते थे। पांडवों और कौरवों में राज्य के लिये युद्ध हुआ, परंतु अंत में जीत पांडवों की हुई और कौरवों की विशाल सेना को हार का मुँह देखना परा। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि असत्य पर सत्य की विज्य हुई। महाभारत कौरव-पांडव युद्ध का प्रतिफल था। महाभारत हमें धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा देता है।

भारत के महान ग्रंथ, भाग 1: रामायण

रामायण हमारे प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथों में से एक है। पृथ्वी पर जब-जब पाप बढ़ा और धर्म की हानि हुई, तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर मानव रूप में मानव के कल्याण करने के लिए अवतार लिया और लोगों को मर्यादा में रहने तथा धर्म का पालन करने की शिक्षा दी।

रामायण की रचना आदि कवि वालमिकी ने संस्कृत भाषा में की थी। रामायण में श्री राम का चरित्र-चित्रण
किया गया है। श्री राम अयोध्या के महाराज दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र थे, वे साहसी, वीर, आज्ञाकारी, गुरू, पितृ और मातृ भक्त थे। इसीलिए भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुशोत्तम कहा जाता है।

श्री राम बहुत ही पराक्रमी थे। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते समय उन्होंने एक तीर से अनेक राक्षसों का वध कर दिया था। वह धनुष-बाण चलाने की कला में अद्वितीय थे। इसीलिए आज भी किसी वस्तु की अमोघता बताने के लिए राम-बाण शब्द का प्रयोग कीया जाता है।

श्री राम ने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार करके पिता के वचन की रक्षा और माता की आज्ञा का पालन किया। रामायण पढ़ते समय ऐसा कहीं भी दिखाई नहीदेता, जहाँ वे मर्यादा-हीन हुए हों। माता, पिता एवं गुरुजन के प्रति विनम्रता तथा स्त्री जाति के प्रति सम्मान, राम के मर्यादा पालन को प्रदर्शित करता है।

श्री राम ने सूग्रीव और विभीषण के साथ मित्रता बहुत ही सुंदर ढंग से निभायी। भाइयों के प्रति स्नेह किस प्रकार
करना चाहिए, रामायण इसका सुंदर उदाहरण है।

राक्षस-राज रावण के अहंकार को नष्ट करके युद्ध में उसका संहार करके श्री राम ने विभीषण को लंका का राज्य सौंप दिया। राम के चरित्र में कहीं भी कोई दोष देखने को नही मिलता है। वे योग्य पुत्र, स्नेह करने वाले भाई, आदर्श पति ,अद्वितीय धनुर्धर और मर्यादा पालक थे। रामायण में श्री राम के बाल काल से लेकर 14 वर्ष का वनवास, लंका पर विजय तथा अयोध्या आने और राज-काज संभालने तक का विवरण है। उनके शासन काल में प्रजा सुख-शांति से रहती थी, आज भी हम लोग राम राज्य जैसे शासन की कल्पना करते हैं।

एड्स :एक आधुनिक दानव

पिछले कई वर्षों से एड्स एक भयावह शब्द बनकर पूरी दुनिया के लोगों को भयभीत कर रहा है। तो यह उचित ही है कि इसे आधुनिक दानव माना जाये। दुनिया का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जो इसके दानवी प्रहार से बचा हुआ हो। यह दानव कभी अज्ञात रूप से आक्रमण करता है तो कभी कुछ लोग अपने कर्मों से इसे दावत देते हैं। इसके प्रचार व प्रसार में अज्ञानता और अशिक्षा ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वैसे तो इस रोग का जन्म पश्चिम के समृद्ध देशों में हुआ है परन्तु इस वैज्ञानिक युग में जब संसार छोटा होता प्रतीत होता है , कुछ भी सीमित नहीं है। अतः सावधान न रहने पर कोई भी इसकी चपेट में आ सकता है।

एड्स के कीटाणु जब शरीर में प्रवेश करते हैं तो तुरन्त कुछ पता नहीं चलता है क्योंकि यह शरीर पर बहुत धीरे-धीरे असर करता है । वास्तव में यह कोई रोग नहीं है बल्कि इससे शरीर की रोग से लड़ने की क्षमता धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है । ऐसी स्थिति में साधारण से साधारण रोग भी बहुत घातक होता है।

एड्स का अभी तो कोई इलाज सामने नहीं आया है। हालाकि इसका प्रभाव कम करने हेतु कुछ दवाएँ उपलब्ध हैं परन्तु ऐसी कोई दवा विकसित नहीं हुई है जो व्यक्ति को रोग से मुक्त कर सके। ऐसी स्थिति में इससे बचने का एक मात्र उपाय सावधानी है। यदि समाज का हर व्यक्ति सवधान रहे तो एड्स का फैलाव पूरी तरह रुक सकता है तथा हम इस आधुनिक दानव को पछाड़ सकते हैं ।

सिनेमा और समाज

सिनेमा बीसवीं सदी में मानव जाति को मिले कुछ बेशकीमती वैज्ञानिक उपहारों में से एक है। इसने विश्व के मनोरंजन के परिदृश्य में एक क्रांति ला दी है क्योंकि इससें पहले नाटक,नौटंकी व त्योहारों के अवसर पर लगने वाले मेले ही लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन थे। क्योंकि ऐसे समागम कभी-कभी ही आयोजित हुआ करते थे , अतः मनोरंजन के मामले में लोग सदा ही अतृप्त रहा करते थे । सिनेमा विश्व के लोगों के लिये मनोरंजन का एक उत्तम साधन बनकर सामने आया है क्योंकि इसे किसी भी वर्ग ,जाति या धर्म के लोग एक साथ देख सकते हैं तथा इसका आनन्द पूरा परिवार एक साथ बैठ कर उठा सकता है।यह मनोरंजन का एक सुलभ साधन बन गया है ।

भारत में अंगरेज़ों के शासन काल से ही फिलमें बनने का सिलसिला आरम्भ हुआ जिसका सफर मूक, संवाद के साथ मगर श्वेत-श्याम और फिर रंगीन फिलमों के दौर से गुज़रा और आज भी भारतीय फिल्में पूरी दुनिया में बड़े चाव से देखी जाती हैं। लेकिन पुरानी फिल्मों और आज के दौर की फिल्मों में एक बड़ा अंतर है कि जहाँ पुरानी फिल्में समाज के सभी वर्गों को ध्यान में रखकर बनाई जाती थीं वहीं आज का सिनेमा पारिवारिक एवं नैतिक हितों को कई तरह से अनदेखी करता है ।

जहाँ तक सिनेमा और समाज के आपसी सम्बंधों की बात है तो अब तक के अनुभवों से यह सिद्ध हो गया है कि दोनों अपनी-अपनी सीमा तक एक दूसरे को प्रभावित करते हैं । हर दशक का सिनेमा तेज़ी से परिवर्तित होते समाज को दर्शाता है । सिनेमा और समाज एक दूसरे के पूरक भी हैं । व्यक्ति थोड़ी देर के लिये ही सही, अपने दुखपूर्ण संसार से बाहर आ जाता है।जिस प्रकार साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है उसी प्रकार सिनेमा भी समाज का दर्पण बनता दिखाई दे रहा है ।

रविवार, 25 नवंबर 2007

मेरा विन्टर का ब्रेक

अब मेरा दिसम्बर में मेरा विन्टर ब्रेक आने वाला है। मैं दो हफ्ते के लिए जाऊंगी। बहुत मजा आयेगा। मैं आइस्कतिंग जाऊंगी, अपने दोस्तो के साथ मिलूंगी। इस बार जब जाऊंगी हो सकता है कि मैं डी ए टी एक्साम लूंगी। यह एक्साम देन्तिस्ट्री के लिए है। मैं मेडिकल मी तो जाऊंगी लेकिन यह है सिर्फ अगर मेडिकल एक्साम नही पास कर पाई। यह एक्साम उतना क्ठिन नहीं है जितना मेडिकल वाला है। लेकिन मेरे इतना सारे दोस्त है कि मुझे कभी कभी पढ़ने में मुश्किल हो जाती है। जब पढ़ने का समयः आता है, तब सब दोस्तों को छोर देना पढ़ ता है। मई भूल जाती हूँ कि मेरा गोल क्या है। मुझे बहुत फिक्र है अपने फुचर के बारे में।