बुधवार, 5 दिसंबर 2007

संस्कृत भाषा


संस्कृत भाषा भारत की ग़ौरवमय अतीत का मुकुट है। संस्कृत भाषा एक अमूल्य एवं अनुपम नीधी है । प्राचीन काल से हमारे जीवन पर उसका बहुत प्रभाव पड़ा है। इस भाषा को हम देव भाषा भी कहते है। संस्कृत जाति, क्षेत्र तथा काल से परे समस्त मानव समाज की भाषा है। सांस्कृतीक वीकास का जैसा चित्रण संस्कृत साहित्य में उपलब्ध है, वैसा चरित्र कहीं और पाना दुर्लभ है । हमारे उपनीषद, रामायण ,महाभारत ,गीता और भागवत वेद पूराण, सभी संस्कृत भाषा में हैं और इनका विश्व भर प्रचार है। जर्मन ,ग्रीक, लैटिन भाषा में संस्कृत विषय पर अनेक ग्रंथ लीखे गये हैं।

मुग़ल बादशाहों के द्वारा पुस्तकालयों के जला देने के उपरांत भी आज संस्कृत के 60000 से अधिक ग्रंथ उपलब्ध हैं। जर्मनी , फ़्रांस, इंग्लेण्डस्ट्रेलीया, अमेरीका आदी देशों के वीद्वानों को संस्कृत भाषा ने आकर्षित कर दिया है। वे लोग आज भी भारत आकर संस्कृत के ग्रंथो में ज्ञान ढुँदते है। आयुर्वेद, चीकीत्सा एवं योग तथा प्रणायाम आदी संस्कृत में लीखे वेदों और पुरणों की देन हैं।

विज्ञान के क्षेत्र में भी संस्कृत का बहुत बड़ा योगदान रहा है । आयुर्वेदिक और ज्योतिष शास्त्रों के ज्ञान ने विश्व को एक बड़ी दीशा दी है। संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा है। इसे साहित्य का सबसे बड़ा भंडार होने का गौरव प्राप्त है। संस्कृत विश्व को सही दीशा देती है । विश्व की प्रगती संस्कृत भाषा की बहुत बड़ी देन है।

1 टिप्पणी:

अनुनाद सिंह ने कहा…

इतनी पुरानी भाषा में इतनी भारी संख्या में ग्रन्थ उपलब्ध होना सचमुच आश्चर्य क विषय है। (पता नहीं कितने ग्रन्थ नष्ट कर दिये गये, कितने जला दिये गये,..) इससे भी आश्चर्य इन ग्रन्थों में वर्णित विषयों की विविधता और बहुलता को देखकर होता है। काव्य, व्याकरण, सौन्दर्य, कहानी, नाटक, कोकशास्त्र, अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, योग, न्याय, दर्शन - आदि हजारों विधाओं में ग्रन्थ लिखे गये। इस पर भी वर्णित विषय को केवल सतही तौर पर नहीं छुआ गया बल्कि इनको बहुत गहराई तक अनुभव करके और विचारकर लिखा गया। संस्कृत भाषा आज भी एक नहीं, सैकड़ों दृष्टियों से विश्व की अद्वितीय भाषा है।