मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

धर्म

धर्म वो है जो हृदय में ईष्वर के प्रति मोड़ दे आप ईष्वर के बताये मार्ग दर्षक पर चल दें तभी हम सही रूप से धार्मिक होंगे। आज इस कलयुग में अपने चरित्र एवं संस्कारों से दूर हो गये हैं। संस्कार रहित होकर केवल आर्थिक एवं अधार्मिक कार्यों में लिप्त हो गये हैं। अतः ईष्वर से बहुत दूर हो गये हैं। बच्चें कच्चे घड़े के समान हैं जिस प्रकार कुम्हार अपना चाक चलाकर मिट्टी को नाना प्रकार के सांचे में ढाल कर अनेक प्रकार की आकृतियां बनाता है उसी तरह बच्चों को भी अच्छे संस्कार में ढालने के लिये घर का वातावरण शुद्ध बनाना होगा एवं माता-पिता को भी अपने में सभी बुराइयों से दूर रहकर, एवं धार्मिक बनना होगा उनके द्वारा किये गये आचरण पर ही बच्चे का भविष्य निर्भर होगा।

सफल और असफल व्यक्तियों के भेद से साहस व ज्ञान की कमी के कारण एवं संकल्प शक्ति के अभाव ही उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होती है। धार्मिक होने के लिये छल-कपट, लोभ, असत्य, चोरी, हिंसा, क्रोध, परिग्रह मायामोह, एवं हिंसा को त्यागना होगा अपने में संस्कार और वातावरण को सही रखना पड़ेगा। अहिंसा धर्म का पालन पूर्णतया करना होगा। अहिंसा धर्म पर चलने की वकालत बहुत से गुरूओं एवं संसार के महापुरूषों ने की है जिसमें भगवान महावीर, भगवान बुद्ध एवं महात्मा गांधी प्रमुख हैं। आज के समय में विस्फोटक सामान निरन्तर बनाये जा रहे हैं ऐसे समय में अहिंसा धर्म का पालन करके संसार को तीसरे महायुद्ध से बचाया जा सकता है।

1 टिप्पणी:

Satyawati ने कहा…

Mahodaya,
Dharam vah nahi hai jo app kah rahe hai. Dharam se tatparya kartavy ka hai jaise pita ka dharam bacchey ke liye. mata ka dharam, patni ka dharam, pati ka dharam, mitra ka dharam. Dharam ka matlab alag- alag jagaho par alag-alag hota hai. Jaise ek hi stri ka pati ke liye dharam alg hai aur putra ke liye alag, pita ke liye kuchh alag aur apne bhai ke liye alag.

Mote taur par ek dusare ke prati jo imandari aur nishpaksh hokar jo kartavya hai vahi Dharam rup se Hindu Shastro me kaha gaya hai.